लोकतंत्र की दुहाई, में खोट...
लोकतंत्र की दुहाई, में खोट...
लोकतंत्र की दुहाई, में खोट...
भारत, जो विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहलाता है, अपनी सांस्कृतिक और सामाजिक विविधता के साथ-साथ अपने लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए भी जाना जाता है। हर राजनीतिक दल, चाहे वह सत्ताधारी हो या विपक्षी, लोकतंत्र की रक्षा करने की बात करता है। लेकिन क्या ये दल स्वयं उन लोकतांत्रिक मूल्यों का पालन करते हैं, जिनकी वे दुहाई देते हैं? यह सवाल आज के भारत में गूंज रहा है, क्योंकि इतिहास और वर्तमान दोनों ही इस बात के साक्षी हैं कि लोकतंत्र की आड़ में सत्ता का खेल खेला जाता रहा है।
आपातकाल 1975: जब भारत जेलखाना बना
25 जून 1975 की आधी रात को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश पर आपातकाल थोप दिया। यह वह दौर था जब भारतीय लोकतंत्र को सबसे बड़ा आघात लगा। विपक्षी नेताओं को रातों-रात जेल में डाल दिया गया, प्रेस पर सेंसरशिप की तलवार लटक गई, और नागरिकों के मौलिक अधिकारों को कुचल दिया गया। लगभग 21 महीनों तक (मार्च 1977 तक) देश में लोकतंत्र का गला घोंटा गया। यह भारतीय इतिहास का वह काला अध्याय है, जिसे कोई भुला नहीं सकता।
सवाल उठता है कि क्या यह लोकतंत्र की रक्षा थी या सत्ता की हवस? आपातकाल ने न केवल देश की स्वतंत्रता पर प्रहार किया, बल्कि यह भी साबित किया कि जब सत्ता की बात आती है, तो लोकतांत्रिक मूल्य आसानी से ताक पर रख दिए जाते हैं।
1984 का कलंक: सिख विरोधी नरसंहार
1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद देश ने एक और दर्दनाक दौर देखा। दिल्ली समेत कई शहरों में सिख समुदाय के खिलाफ हिंसा भड़क उठी। हजारों निर्दोष सिखों को क्रूरता से मार डाला गया। इस नरसंहार में कुछ कांग्रेस नेताओं पर भीड़ को उकसाने के गंभीर आरोप लगे। यह वह समय था जब इंसानियत शर्मसार हुई और लोकतंत्र लहूलुहान हुआ।
क्या यह हिंसा सत्ता की रक्षा के लिए थी? क्या लोकतंत्र का मतलब केवल सत्ता में बने रहना है, चाहे इसके लिए कितने ही निर्दोष लोगों की बलि क्यों न देनी पड़े? यह सवाल आज भी अनुत्तरित है।
असहमति का गला घोंटने की परंपरा
लोकतंत्र की आत्मा असहमति को सुनने और उसका सम्मान करने में निहित है। लेकिन भारतीय राजनीति में असहमति को दबाने की परंपरा पुरानी है। कुछ उदाहरण इस बात को स्पष्ट करते हैं:
= शशि थरूर (2014): जब शशि थरूर ने तत्कालीन विपक्षी नेता नरेंद्र मोदी की कुछ नीतियों की सराहना की, तो उन्हें कांग्रेस के प्रवक्ता पद से हटा दिया गया।
= K. N. राजन्ना (कर्नाटक, 2025): कांग्रेस शासन के दौरान मतदाता सूची में गड़बड़ी स्वीकार करने की सजा उन्हें मंत्रिपद से हटाकर चुकानी पड़ी।
= पूजा पाल (सपा, यूपी): माफिया अतीक अहमद के खिलाफ कार्रवाई की सराहना करने पर समाजवादी पार्टी ने उन्हें निष्कासित कर दिया।
= इन उदाहरणों से साफ है कि विपक्षी दलों में पार्टी लाइन से हटकर बोलना राजनीतिक आत्महत्या के समान है। क्या यह लोकतंत्र है, जहां सच बोलने की सजा दी जाती है?
लोकतंत्र या परिवारवाद?
कांग्रेस, जो देश में 50 साल से अधिक समय तक सत्ता में रही, ने लोकतांत्रिक परंपराओं को मजबूत करने की बजाय परिवारवाद को बढ़ावा दिया। आज भी पार्टी का नेतृत्व गांधी परिवार तक सीमित है। सवाल उठता है कि क्या इतनी बड़ी पार्टी में गांधी परिवार के बाहर कोई सक्षम नेता नहीं है? यह केवल कांग्रेस की बात नहीं, बल्कि कई अन्य दलों में भी परिवारवाद की जड़ें गहरी हैं।
= "सत्यमेव जयते" की जगह आज राजनीतिक दलों का नारा बन गया है—"पार्टी सर्वोपरि।" यह स्थिति लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी है।
असली सवाल: लोकतंत्र या सत्ता का खेल?
आज भाजपा पर लोकतंत्र की हत्या का आरोप लगाने वाले विपक्षी दल स्वयं अपने इतिहास में लोकतांत्रिक मूल्यों को कुचलते रहे हैं। चाहे वह आपातकाल हो, सिख नरसंहार हो, या असहमति को दबाने की परंपरा—हर बार लोकतंत्र को सत्ता के हथियार के रूप में इस्तेमाल किया गया।
लोकतंत्र का असली मतलब जनता की आवाज को सुनना और उसका सम्मान करना है। लेकिन आज यह केवल सत्ता हासिल करने का जरिया बनकर रह गया है। राजनीतिक दल लोकतंत्र की दुहाई तो देते हैं, लेकिन उनके कार्य लोकतंत्र की आत्मा को बार-बार चोट पहुंचाते हैं।
लोकतंत्र की सच्चाई
भारत का लोकतंत्र विश्व में एक मिसाल है, लेकिन इसे मजबूत करने की जिम्मेदारी केवल नेताओं की नहीं, बल्कि जनता की भी है। जब तक जनता अपने नेताओं से सवाल नहीं पूछेगी, तब तक लोकतंत्र की दुहाई देने वाले दल इसका दुरुपयोग करते रहेंगे।
आज जरूरत है कि हम लोकतंत्र को केवल एक शब्द नहीं, बल्कि एक जीवंत मूल्य के रूप में देखें। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि लोकतंत्र सत्ता का खेल न बने, बल्कि जनता की आवाज बने। यही भारत के उज्ज्वल भविष्य की कुंजी है।
– Indian News Adda संपादकीय टीम
Adv. तुषार पाटील
संपादक
इंडियन न्यूज़ अड्डा
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"तथ्यों के साथ, भावनाओं के पार"
✍ लेखक: Indian News Adda संपादकीय टीम



