जिधर बम, उधर हम”: अमेरिका की दोस्ती का व्यापारिक फार्मूला

जिधर बम, उधर हम”: अमेरिका की दोस्ती का व्यापारिक फार्मूला

जिधर बम, उधर हम”: अमेरिका की दोस्ती का व्यापारिक फार्मूला

“जिधर बम, उधर हम”: अमेरिका की दोस्ती का व्यापारिक फार्मूला
✍️ लेखक: INDIAN NEWS ADDA टीम

"जिससे फायदा हो, वह दोस्त — जिससे नुकसान हो, वह दुश्मन।"
यह लाइन अमेरिका की विदेश नीति का संक्षिप्त लेकिन सटीक वर्णन है।

अमेरिका, जिसे दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र और वैश्विक शक्ति माना जाता है, असल में एक ऐसा व्यापारी राष्ट्र है जिसकी नीतियाँ "नफे-नुकसान" के तर्ज पर चलती हैं। आदर्शवाद, नैतिकता, और मानवाधिकार जैसे शब्द उसके भाषणों में जरूर होते हैं, पर फैसलों में नहीं।

 अमेरिका: दोस्ती भी सौदेबाज़ी में

जब अमेरिका भारत से दोस्ती करता है, तो वह केवल चीन को काउंटर करने के लिए होता है।
जब वह पाकिस्तान को फंडिंग देता है, तो वह सिर्फ अपने अफगानिस्तान मिशन या मध्य एशिया की पहुँच के लिए होता है।
जब वह इराक, सीरिया या यूक्रेन में "शांति" लाने की बात करता है, तो वहां का तेल, हथियार बाजार, और भौगोलिक दखल उसके असली मकसद होते हैं।

 “जिधर बम, उधर हम” – अमेरिकी नीति का मूलमंत्र

अमेरिकी हस्तक्षेप कभी मानवीय नहीं रहा। जहां बम गिरते हैं, वहां अमेरिका अपने टैंक और कंपनियां दोनों भेजता है।

=इराक में तेल
=अफगानिस्तान में अफीम और भू-स्थिति
=यूक्रेन में हथियार उद्योग
=और अब एशिया में चीन की घेराबंदी
हर मोर्चे पर अमेरिका सिर्फ वही करता है जो उसके कॉर्पोरेट हितों और सत्ता संतुलन को साधे।

 नैतिकता का दिखावा = व्यापारी की चाल
=अगर किसी व्यापारी को बड़ा बनना है, तो उसे "आदर्शवादी" बनकर दिखाना होगा — ठीक वैसा ही जैसे अमेरिका करता है:
=मानवाधिकार की बातें, पर सऊदी अरब से तेल समझौते
=लोकतंत्र की बातें, पर पाकिस्तान और मिस्र जैसे देशों को समर्थन
=शांति की बातें, पर हथियारों का सबसे बड़ा निर्यातक
=असल में उसके पास कोई उसूल नहीं हैं। और यही उसूल न होना उसका सबसे बड़ा उसूल है — और सबसे बड़ा पैसा कमाने का तरीका भी।

 भारत को सीखने की जरूरत है क्या?

भारत को अमेरिका की इस नीति से सतर्क रहना होगा।हमें यह समझना होगा कि अमेरिका का दोस्त वही होता है, जो उस वक़्त उसके लिए फायदेमंद हो।इसलिए भारत को अपनी विदेश नीति "स्वदेशी स्वार्थ" के आधार पर बनानी चाहिए — जिसमें हमारा हित सर्वोपरि हो, न कि किसी और का आदर्शवाद।

दोस्ती में भी व्यापार छुपा है
"जिधर बम, उधर हम" – यही अमेरिका का असली चरित्र है।
इसलिए हमें हर दोस्ती में उसकी शर्तें और मूल्य समझने होंगे।
क्योंकि अगर आप अमेरिका के साथ बगैर शर्तों के दोस्त बनेंगे, तो आप उसके बिजनेस मॉडल का हिस्सा बन जाएंगे — ग्राहक बनकर, साथी नहीं।