दुर्लभ मनुष्य जीवन की सार्थकता निंदा- चुगली में नहीं, दूसरों की आंखों के आंसू पोंछने में
इंदौर। दुर्लभ मनुष्य जीवन की सार्थकता केवल खाने-पीने ,सोने, निंदा और चुगली करने में नहीं, बल्कि दूसरों की आंखों के आंसू पोंछने और सेवा-सदभाव के चिंतन में है। आज के दौर में सनातन धर्म और संस्कृति के संवर्धन के लिए समाज को एकजुट होने की जरूरत है। हमारे धर्मग्रंथो ने भी मातृभूमि की रक्षा को सबसे बड़ा कर्तव्य बताया है। हम धर्म की रक्षा करेंगे तो धर्म भी हमारी रक्षा करेगा।
कथा शुभारंभ के पूर्व श्रीमती कांता अग्रवाल, कमल राठी, मनोज गुप्ता एवं गीता भवन ट्रस्ट मंडल के सदस्यों ने व्यासपीठ का पूजन किया।
आचार्य महामंडलेश्वर ने कहा कि भागवत केवल ग्रंथ नहीं, भारत भूमि की मूल्यवान धरोहर है। जीवन के सभी संशयों का समाधान केवल भागवत में ही मिल सकता है, जिस ग्रंथ की रचना स्वयं भगवान ने जीव मात्र के कल्याण के लिए की है हो, उसकी प्रासंगिकता कभी खत्म नहीं हो सकती।


