"चीन से समझौता और लोकतंत्र पर संदेह: कांग्रेस पार्टी का 2008 MoU और राष्ट्रहित की अनदेखी"

"चीन से सांठगांठ या विचारों का आदान-प्रदान? कांग्रेस और CPC समझौते पर उठते बड़े सवाल"

"चीन से समझौता और लोकतंत्र पर संदेह: कांग्रेस पार्टी का 2008 MoU और राष्ट्रहित की अनदेखी"

सम्पादकीय | इंडियन न्यूज़ अड्डा

"चीन से समझौता और लोकतंत्र पर संदेह: कांग्रेस पार्टी का 2008 MoU और राष्ट्रहित की अनदेखी"
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भारत का राजनीतिक परिदृश्य केवल चुनावी मुद्दों या संसद के शोरगुल से नहीं चलता, बल्कि उन गहरे निर्णयों और रिश्तों से भी प्रभावित होता है, जो बंद दरवाज़ों के पीछे तय होते हैं। ऐसे ही एक ऐतिहासिक, परंतु आज भी रहस्यमय फैसले की चर्चा फिर उठ रही है—कांग्रेस पार्टी और चीन की सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना (CPC) के बीच 2008 में हुआ आधिकारिक समझौता (MoU)।
इस समझौते को लेकर सवाल आज भी जिंदा हैं, बल्कि अब और भी ज़्यादा ज़रूरी हो गए हैं जब चीन भारत के लिए रणनीतिक और भू-राजनीतिक खतरा बन चुका है। भारत और चीन के संबंध दशकों से संघर्ष, अविश्वास और सीमा विवादों के इर्द-गिर्द घूमते रहे हैं। इन सबके बीच 2008 में हुआ कांग्रेस पार्टी और चीन की सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट पार्टी (CPC) के बीच एक रहस्यमयी MoU (समझौता ज्ञापन) आज भी एक ऐसा सवाल है, जिसका जवाब देश को अब तक नहीं मिला।
भारत का नंबर 1 दुश्मन चीन है—यह बात खुद कांग्रेस के कई नेताओं ने अतीत में मानी है। फिर सवाल उठता है कि क्या यह उचित था कि उसी चीन की सत्ताधारी पार्टी के साथ कांग्रेस पार्टी ने एक राजनीतिक समझौता किया? और यदि किया, तो उसे छुपाया क्यों गया?

=2008 का MoU: एक संदेहजनक संधि
7 अगस्त 2008 को बीजिंग में कांग्रेस पार्टी (प्रतिनिधि: राहुल गांधी) और CPC (प्रतिनिधि: वांग जिया रुई) के बीच यह MoU साइन हुआ था।
इसका उद्देश्य बताया गया:
"आपसी राजनीतिक संवाद, सहयोग और विचारों का आदान-प्रदान।"
सवाल ये है कि क्या यह सहयोग भारत और चीन के संबंधों को बेहतर बनाने के लिए था, या फिर एक गोपनीय राजनीतिक समीकरण, जो आज तक न जनता के सामने आया, न संसद में रखा गया, न ही कांग्रेस ने कोई जवाबदेही दिखाई।

= चीन: वह देश जिसे कांग्रेस सरकारें भी दुश्मन कह चुकी हैं
1962 में चीन ने भारत पर हमला किया, जिसका गहरा राजनीतिक और सैन्य घाव आज तक भारत की स्मृति में है। 2013, 2017, 2020 (गलवान) — चीन की विस्तारवादी नीति, सीमा घुसपैठ और सैन्य तनावों के समय हर सरकार और दल ने चीन को ‘सुरक्षा चुनौती’ माना।
कांग्रेस के नेता स्वयं लद्दाख और अरुणाचल में चीन के अतिक्रमण को बार-बार मुद्दा बनाते रहे हैं। तो सवाल है: जिस देश को आप बार-बार "अतिक्रमणकारी", "अविश्वसनीय", और "तानाशाही" कहते हैं, उससे ही आपकी पार्टी ने समझौता क्यों किया?

= ???? क्यों नहीं अमेरिका, फ्रांस या जापान?
दुनिया में ऐसे कई देश हैं जो भारत जैसे लोकतंत्र को समझते हैं, उसकी कद्र करते हैं।
अमेरिका, फ्रांस, जापान, दक्षिण अफ्रीका, कनाडा – ये सभी मजबूत लोकतांत्रिक ढांचे वाले राष्ट्र हैं। फिर कांग्रेस पार्टी ने उनके साथ कोई राजनीतिक समझौता क्यों नहीं किया? क्या कांग्रेस को लोकतंत्र चलाने के लिए चीन जैसे अधिनायकवादी देश से सीखने की जरूरत थी?
या यह मान लिया जाए कि कांग्रेस पार्टी को उस समय CPC में अपनी कोई विचारधारा या सहयोगी दिखी? क्या यह कांग्रेस की वैचारिक कमजोरी थी, या रणनीतिक भूल?  भारत एक लोकतांत्रिक देश है। उसके मूल्य हैं: अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता-  न्यायपालिका की स्वतंत्रता - चुनावों की पारदर्शिता - लोकतंत्र की संस्थागत ताकत - तो फिर कांग्रेस ने अमेरिका, फ्रांस, ब्रिटेन, जापान, या अफ्रीकी लोकतंत्रों के साथ कोई वैचारिक या राजनीतिक MoU क्यों नहीं किया?  क्या कांग्रेस पार्टी को चीन से सीखने की ज़रूरत है? क्या भारत का लोकतंत्र कमजोर है या कांग्रेस का विश्वास डगमगाया हुआ है?

⚠️ लोकतंत्र बनाम तानाशाही: किससे सीखे कौन?
चीन एक ऐसा देश है जहाँ— प्रेस की आज़ादी नहीं है,- अदालतें सरकार के अधीन हैं, -सत्ता आजीवन एक ही पार्टी के पास है,-और विरोध का कोई अधिकार नहीं।

भारत एक ऐसा देश है जहाँ— जनता सरकार बदल सकती है,- अदालतें स्वतंत्र हैं, - प्रेस सवाल पूछ सकता है,- और विपक्ष ज़ोर से बोल सकता है।-  तो क्या चीन को भारत से सीखना चाहिए या भारत की सबसे पुरानी पार्टी चीन से? -यह समझौता केवल एक राजनीतिक औपचारिकता नहीं था, यह राजनीतिक सोच और राष्ट्रहित की प्राथमिकता का भी संकेत था।

= कांग्रेस की चुप्पी: जवाबदेही का संकट
इस MoU को लेकर आज तक कांग्रेस ने: न इसकी कॉपी सार्वजनिक की,  न संसद में इसकी विवरण दिया, न यह बताया कि आज भी यह सक्रिय है या समाप्त हो चुका है, और न ही यह स्पष्ट किया कि क्या इसका कोई आर्थिक, रणनीतिक या वैचारिक प्रभाव भारत की नीतियों पर पड़ा। जब बीजेपी से संबंधित मुद्दों पर कांग्रेस हर दिन कोर्ट में याचिका और मीडिया में आरोप लगाती है, तो क्या वही कांग्रेस अपने कार्यों पर चुप रहने का विशेषाधिकार रखती है? क्या यह दोहरे चरित्र का उदाहरण नहीं?

=लोकतंत्र और राष्ट्रीय सुरक्षा: क्या कोई समझौता संभव है?
किसी राजनीतिक पार्टी का विदेशी पार्टी से संवाद कोई असामान्य बात नहीं, पर जब यह संवाद एक ऐसे देश की सत्तारूढ़ पार्टी से हो—
जो तानाशाही से चलता है, जिसकी पार्टी और सेना एक-दूसरे में विलीन हैं, जो भारत के सीमाओं का अतिक्रमण करता है, तो यह केवल कूटनीतिक प्रश्न नहीं, राष्ट्रीय सुरक्षा और लोकतंत्र की साख का मामला बन जाता है।  क्या चीन को हमसे लोकतंत्र सीखना चाहिए या हमें चीन से तानाशाही?

=  सवाल अब भी बाकी हैं...
"सवाल पूछना विरोध नहीं, लोकतंत्र की रक्षा है। लेकिन जवाब देना भी जरूरी है – खासकर जब सवाल खुद आपसे हों।"
कांग्रेस से यह उम्मीद की जाती है कि वह विपक्ष की भूमिका में तथ्यों और जिम्मेदारी से बोले, पर जब बात खुद पर आती है, तो मौन साध लेना राजनीतिक नैतिकता की हत्या है। कांग्रेस को यह स्पष्ट करना चाहिए: - 2008 का MoU क्या था? - आज उसकी स्थिति क्या है? -क्या वह चीन की विचारधारा से प्रभावित है? - और क्या देशहित से ऊपर निजी राजनीतिक समीकरण हैं? 
क्योंकि यदि जवाब नहीं दिए गए, तो संदेह बढ़ेगा, और लोकतंत्र को केवल सत्ता की लड़ाई समझने वाले नेता ही नहीं, उसकी आत्मा पर भी हमला करेंगे।

– Indian News Adda संपादकीय टीम

Adv. तुषार पाटील 
संपादक 
इंडियन न्यूज़ अड्डा 

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