"झूठ की सियासत बनाम लोकतंत्र की गरिमा: राहुल गांधी से SC का सवाल और विपक्ष की साख पर संकट"

"झूठ का सहारा या सच्चाई की हार? राहुल गांधी की बयानबाजी और लोकतंत्र पर उसका असर"

"झूठ की सियासत बनाम लोकतंत्र की गरिमा: राहुल गांधी से SC का सवाल और विपक्ष की साख पर संकट"

सम्पादकीय | इंडियन न्यूज़ अड्डा
"झूठ की सियासत बनाम लोकतंत्र की गरिमा: राहुल गांधी से SC का सवाल और विपक्ष की साख पर संकट"
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क्या आज का भारत ऐसा बन गया है जहाँ कोई भी कुछ भी कह दे, और फिर उसे "राजनीतिक बयान" कहकर पल्ला झाड़ ले? क्या आरोप लगाने के लिए अब सबूत की आवश्यकता नहीं रही? सवाल बुनियादी है: क्या भारत जैसे लोकतांत्रिक राष्ट्र में राजनीति अब जिम्मेदारी से मुक्त हो चुकी है?
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में कांग्रेस नेता राहुल गांधी से सीधा और तीखा सवाल पूछा—"कैसे पता चला कि चीन ने भारत की जमीन हड़पी?" यह सवाल केवल राहुल गांधी से नहीं, बल्कि उस समूचे विपक्ष से है जो आजकल तथ्यों की बजाय भावनाओं, अफवाहों और भ्रम का सहारा लेकर देश की जनता को दिशा देने की कोशिश करता है। यह लोकतंत्र के नाम पर छवि बिगाड़ने का नया चलन है।
भारतीय लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता एक अमूल्य अधिकार है, लेकिन जब यह स्वतंत्रता तथ्यहीन आरोपों और भ्रम फैलाने का माध्यम बन जाए, तो लोकतंत्र का आधार ही कमजोर होने लगता है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी के राजनीतिक बयानों का इतिहास देखें, तो एक विचित्र विरोधाभास सामने आता है—नेता तो देशहित की बात करते हैं, लेकिन बार-बार देश की गरिमा और लोकतंत्र की मर्यादा को ठेस पहुंचाने वाले बयान देते हैं।

= विपक्ष की भूमिका या भ्रम की राजनीति ?
विपक्ष लोकतंत्र की आत्मा होता है। उसकी जिम्मेदारी है सरकार की गलतियों पर उंगली उठाना, पर जब आरोप तथ्यों पर नहीं, बल्कि मनगढ़ंत धारणाओं पर टिके हों तो यह भूमिका हास्यास्पद बन जाती है। हर बार बिना सबूत के लगाए गए आरोप, संसद के भीतर और बाहर, न केवल सरकार की छवि को प्रभावित करते हैं बल्कि पूरी राजनीतिक व्यवस्था को अविश्वास के गर्त में धकेल देते हैं।
यदि विपक्ष का यही तरीका रहा—कोरी बयानबाजी और संवेदनशील मुद्दों पर भी तथ्यहीन आक्रोश—तो जनता का भरोसा केवल सरकार से ही नहीं, विपक्ष से भी उठ जाएगा। और जब विपक्ष अविश्वसनीय हो जाए, तब लोकतंत्र केवल एकतरफा हो जाता है।
जब विपक्ष केवल झूठ और भावनात्मक उकसावे का सहारा लेता है, तो वह जनता के सामने एक मजाक बनकर रह जाता है। प्रामाणिकता के अभाव में विपक्ष केवल आलोचना करने वाला शोर बन जाता है, जिसमें कोई दिशा नहीं होती, कोई समाधान नहीं होता।
विपक्ष को चाहिए कि वह तथ्यों और नीतियों पर सरकार को घेरें, लेकिन जब हर आरोप का अंत कोर्ट की डांट या माफीनामा पर होता है, तो यह विपक्ष की कमजोरी नहीं, उसकी विश्वसनीयता का पतन है।


= सुप्रीम कोर्ट की चेतावनी और राहुल गांधी की राजनीतिक समझदारी
यह पहली बार नहीं जब राहुल गांधी को न्यायालय से फटकार या चेतावनी मिली हो। इससे पहले भी मानहानि मामलों में उनकी गैर-जिम्मेदाराना बयानबाजी उन्हें घेर चुकी है। परंतु न तो कांग्रेस पार्टी ने इससे कोई सबक सीखा, न ही राहुल गांधी की राजनीतिक रणनीति में कोई परिपक्वता नजर आती है।
किसी नेता की छवि तब प्रभावित होती है जब वह बार-बार गंभीर आरोप लगाता है और कोर्ट में पूछे जाने पर उसके पास “ठोस सबूत” नहीं होते। इससे यह छवि बनती है कि या तो वह स्वयं भ्रमित है, या फिर जानबूझकर देश की जनता को गुमराह कर रहा है। और ऐसे नेता अगर स्वयं को "सच्चा भारतीय" कहते हैं, तो वे उस राष्ट्रभक्ति की भावना का भी उपहास कर रहे हैं, जिसकी दुहाई वे अक्सर देते हैं।
राहुल गांधी ने अपने राजनीतिक जीवन में कई बार सरकार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, और विभिन्न संस्थानों पर गंभीर आरोप लगाए हैं, जिनमें से कई मामलों में उन्हें कोर्ट से डांट या फटकार झेलनी पड़ी है।

#1. ‘मोदी सरनेम’ मानहानि मामला (2019)
आरोप:
राहुल गांधी ने कर्नाटक में एक रैली के दौरान कहा था –
"कैसे सभी चोरों का सरनेम मोदी होता है?"
परिणाम:
गुजरात के बीजेपी विधायक पूर्णेश मोदी ने मानहानि का केस दायर किया।
सूरत कोर्ट ने 2023 में राहुल गांधी को दोषी ठहराते हुए 2 साल की सजा सुनाई, जिससे उनकी लोकसभा सदस्यता भी खत्म हुई थी।
बाद में सुप्रीम कोर्ट ने सजा पर स्थगन (Stay) दिया और उनकी सदस्यता बहाल हुई, लेकिन कोर्ट ने उनकी गैर-जिम्मेदार बयानबाजी पर टिप्पणी की।

#2. राफेल डील पर ‘चौकीदार चोर है’ बयान (2018-19)
आरोप:
राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री मोदी को लेकर कई बार कहा –
"चौकीदार चोर है"
यह टिप्पणी राफेल डील पर की गई थी।
परिणाम:
सुप्रीम कोर्ट ने जब राफेल डील को क्लीन चिट दी, तब राहुल गांधी ने कोर्ट के फैसले को तोड़-मरोड़कर पेश किया और कहा कि "SC ने भी कहा चौकीदार चोर है"।
कोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए उनसे जवाब मांगा।
राहुल गांधी को कोर्ट में माफीनामा (Unconditional Apology) देना पड़ा।

#3. वीर सावरकर पर आपत्तिजनक बयान
आरोप:
कई बार वीर सावरकर के खिलाफ बयान देते हुए राहुल गांधी ने कहा –
"सावरकर ने अंग्रेजों से माफी मांगी थी, मैं राहुल गांधी हूं, सावरकर नहीं हूं।"
परिणाम:
महाराष्ट्र और अन्य राज्यों में बीजेपी और शिवसेना (शिंदे गुट) की ओर से विरोध हुआ।
कुछ जगहों पर एफआईआर दर्ज हुई, लेकिन कोई सीधा कोर्ट केस बड़ा नहीं बना।
हालांकि, समाज में व्यापक विरोध और वैचारिक ध्रुवीकरण हुआ।

#4. 2023 में लद्दाख और चीन पर बयान
आरोप:
राहुल गांधी ने कहा कि "चीन ने भारत की जमीन हड़प ली है और PM मोदी झूठ बोलते हैं"।
परिणाम:
हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने पूछ लिया:
"आपके पास क्या पुख्ता सबूत हैं कि चीन ने जमीन हड़पी?"
कोर्ट ने राहुल गांधी के बयान को गंभीर और देशहित के खिलाफ बताया।
अब कोर्ट में जवाब मांगा गया है – यह मामला चल रहा है।

#5. बीजेपी-RSS को लेकर ‘हत्या संस्कृति’ वाला बयान
आरोप:
2014 के बाद कई बार राहुल गांधी ने RSS और BJP को "हत्या संस्कृति", "नफरत फैलाने वाला संगठन", "महात्मा गांधी के हत्यारों के समर्थक" जैसे शब्दों से जोड़ा।
परिणाम:
कई मामलों में मानहानि केस दर्ज हुए।
एक मामला RSS कार्यकर्ता द्वारा दायर किया गया, जिसमें भी उन्हें कोर्ट में सफाई देनी पड़ी और बाद में माफीनामा दिया।

=लोकतंत्र, बहुमत और जिम्मेदारी
यह बात बार-बार समझनी होगी कि किसी चुनी हुई सरकार पर झूठे आरोप लगाना, न सिर्फ लोकतंत्र का अपमान है बल्कि जनता के फैसले का भी अपमान है। सरकारें बहुमत से बनती हैं, और बहुमत जनता का विश्वास दर्शाता है। विपक्ष का काम आलोचना करना है, लेकिन बिना प्रमाण, आरोप लगाने का काम नहीं।
आज भारत को सशक्त विपक्ष की जरूरत है, लेकिन एक जिम्मेदार विपक्ष की, जो सवाल पूछे, पर समाधान के सुझाव भी दे। परंतु वर्तमान विपक्ष सिर्फ “हंगामा” और “हैडलाइन” बनाने में व्यस्त दिखता है।
सत्ता के गलियारों में बैठने की लालसा रखने वालों को समझना होगा कि बयान एक हथियार है, लेकिन वह दोधारी तलवार भी बन सकता है। बार-बार गलत आरोप लगाने से केवल खुद की साख नहीं जाती, बल्कि लोकतंत्र की परिपक्वता भी सवालों के घेरे में आ जाती है।
राहुल गांधी को चाहिए कि वह विपक्ष की जिम्मेदारी को गंभीरता से समझें, न कि हर मंच को एक चुनावी स्टंट बनाने की कोशिश करें।
विपक्ष का काम है जागरूकता, न कि अराजकता।

=विपक्ष की साख पर संकट
राहुल गांधी जैसे नेता, जब बार-बार कोर्ट की चेतावनी के बावजूद वही गलती दोहराते हैं, तो प्रश्न उठता है—क्या कांग्रेस पार्टी अपनी प्रासंगिकता स्वयं मिटा रही है? क्या विपक्ष के पास अब मुद्दे नहीं बचे, जो उसे झूठ और भ्रम की राजनीति करनी पड़ रही है?
यदि यही क्रम चला, तो विपक्ष केवल "फॉर्म में मौजूद नाम" बनकर रह जाएगा, जिसकी कोई राजनीतिक विश्वसनीयता नहीं बचेगी। और जब जनता विकल्पहीन हो जाए, तब लोकतंत्र की आत्मा भी संकट में आ जाती है।

वक्त है जब देश की राजनीति में भाषा और बयान की गरिमा फिर से स्थापित की जाए। आरोप हों, तो सबूत भी हों। असहमति हो, तो तार्किक हो। और नेतृत्व हो, तो जिम्मेदार हो। वरना आने वाले वर्षों में जनता ना सरकार पर भरोसा करेगी, ना विपक्ष पर—और यह लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा होगा।
सुप्रीम कोर्ट का राहुल गांधी से सवाल—"कैसे पता चीन ने जमीन हड़पी?"—केवल एक कानूनी जिज्ञासा नहीं, बल्कि एक राजनीतिक चेतावनी भी है। अब वक्त है कि नेता केवल बोलने से पहले सोचें भी। क्योंकि जब आरोप झूठे निकलते हैं, तो विश्वास टूटता है, और लोकतंत्र को उसकी सबसे बड़ी ताकत—जनता का भरोसा—खोना पड़ता है।

– Indian News Adda संपादकीय टीम

Adv. तुषार पाटील 
संपादक 
इंडियन न्यूज़ अड्डा 

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"तथ्यों के साथ, भावनाओं के पार"