भक्त और भगवान को जोड़ने की कथा है भागवत
इंदौर। भगवान और भक्त एक-दूसरे के पूरक भी हैं और पर्याय भी हैं। भगवान के बिना भक्त का और भक्त के बिना भगवान का काम चल ही नहीं सकता। भगवान स्वयं कहते हैं कि मैं केवल भक्तों के ही अधीन हूं। भारत भूमि भक्तों की ही भूमि मानी जाती है। हमारे देश में भक्तों की इतनी वृहद श्रृंखला है कि आज भी हर अंचल में भक्तों की महिमा और यशगाथा सुनी जा सकती है। भागवत भक्त और भगवान को जोड़ने की कथा है। राम और कृष्ण के बिना भारतीय सनातन संस्कृति और जन मानस, दोनों ही परिपूर्ण नहीं हो सकते।
राजेंद्र नगर स्थित टंकी हॉल पर परशुराम महासभा की मेजबानी में चल रहे भागवत ज्ञान यज्ञ में राम और कृष्ण जन्म प्रसंगों की व्याख्या के दौरान उक्त दिव्य विचार व्यक्त किए। कथा में पहले राम और बाद में कृष्ण जन्मोत्सव भी धूमधाम से मनाए गए। कृष्ण जन्म होते ही समूचा टंकी हाल मनोहारी भजनों पर नाच उठा। माखन-मिश्री की वर्षा के बीच सैकड़ों भक्तों ने इस उत्सव का आनंद लिया।
भागवताचार्य पं. ऋषभदेव महाराज ने कहा कि सुख का मुल धर्म है। शास्त्र हमें बार-बार इसीलिए धर्म की ओर प्रेरित करते हैं। धर्म का आश्रम ही हमें सुख प्रदान करेगा। सनातन धर्म को सर्वश्रेष्ठ कहा गया है, क्योंकि हम किसी के भी प्रति नुकसान, द्वेष और प्रतिद्वंद्वीता का भाव नहीं रखते। धर्म ही वह तत्व है, जो हमें मानव से महामानव की ओर प्रश्सत करेगा। आज विडंबना यह है कि हम वेद-पुराण और धर्म ग्रंथों की बातों को सुनना भी पसंद नहीं करते, मानना तो दूर की बात है। हमारी नई पौध इन धर्मग्रंथों की पहुंच से दूर होती जा रही है। जब कभी हमारा मन मनमाने आचरण की ओर भटकने लगे तब शास्त्रों की बातों पर अवश्य अमल करना चाहिए। शास्त्र ही हमें भटकाव से रोकेंगे।



