*"भारत नहीं झुका: कैसे करेंगे पाबंदियों का मुकाबला?"*
*"भारत नहीं झुका: कैसे करेंगे पाबंदियों का मुकाबला?"*
सम्पादकीय | Indian News Adda
*"भारत नहीं झुका: कैसे करेंगे पाबंदियों का मुकाबला?"*
– *अमेरिका की धमकियों के बावजूद भारत का आत्मनिर्भर रुख*
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*जब-जब भारत ने अपनी विदेश नीति, रणनीतिक हितों या घरेलू प्राथमिकताओं के आधार पर निर्णय लिए हैं, तब-तब पश्चिमी देशों खासकर अमेरिका की ओर से दबाव, पाबंदियां और धमकियां देखने को मिली हैं। फिर चाहे बात 1971 के युद्ध के दौरान 7वां बेड़ा भेजने की हो, गेहूं निर्यात पर रोक लगाने की, हथियारों की आपूर्ति में टालमटोल की या अब टैरिफ वॉर की धमकी की — भारत ने झुकना नहीं सीखा।*
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भारत- अमेरिका विवाद को एक बड़ी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि है 1971: अमेरिका का जंगी 7वां बेड़ा भारत के खिलाफ उतरा और भारत की कूटनीतिक दृढ़ता ने अमेरिकी हौसले परास्त किये. बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के दौरान जब भारत ने पाकिस्तान की सैन्य ज्यादतियों के खिलाफ मोर्चा खोला, अमेरिका ने अपना 7वां बेड़ा हिंद महासागर में भेजकर भारत पर दबाव बनाने की कोशिश की। परंतु भारत पीछे नहीं हटा। सोवियत संघ के साथ 20 वर्षों के मैत्री समझौते ने इस चुनौती को संतुलित किया।
गेहूं संकट: शीत युद्ध के दौरान अमेरिका ने कई बार खाद्यान्न सहायता को हथियार के रूप में इस्तेमाल किया और हथियार प्रतिबंध: परमाणु परीक्षण के बाद 1998 में व्यापक प्रतिबंध लगाए गए। इसके पहले भी 2019 के टैरिफ: ट्रम्प के पहले कार्यकाल में भी इसी तरह की धमकियां दी गई थीं
जब 2022 में भारत ने जब घरेलू खाद्य सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए गेहूं निर्यात पर अस्थायी रोक लगाई, तब G7 देशों और WTO की ओर से आलोचना हुई। भारत ने दो टूक कहा: “हम 140 करोड़ की जनसंख्या का पेट पहले भरेंगे।” अर्थात भारत बड़े ही गंभीरता से अमेरिका का पहले भी सामना कर चूका है. इस लिए यह चौनौती कोई नहीं.
रक्षा सौदों में अमेरिकी हस्तक्षेप रहा है और हर बार भारत का आत्मनिर्भर जवाब अमेरिका को मिलता रहा है. भारत-रूस S-400 मिसाइल डील को लेकर अमेरिका ने CAATSA प्रतिबंधों की धमकी दी। भारत ने फिर भी डील जारी रखी, यह कहकर कि राष्ट्रीय सुरक्षा किसी विदेशी दबाव से ऊपर है। अमेरिका की नाराजगी के बावजूद भारत पीछे नहीं हटा।
हर बार अमेरिका भारत को अलग अलग तरीके से दबाव डालता रहा परन्तु अब की चुनौती: टैरिफ वॉर की है. ट्रम्प युग में टैरिफ वॉर और भारत का प्रतिरोध का प्रारम्भ शुरू हो चूका है. ट्रम्प प्रशासन ने भारत को ‘Generalized System of Preferences’ (GSP) से बाहर कर दिया और भारतीय उत्पादों पर टैरिफ बढ़ा दिए। जवाब में भारत ने भी अमेरिकी उत्पादों पर शुल्क बढ़ाया। भारत ने कहा कि वह मुट्ठी भर व्यापार लाभ के लिए अपनी संप्रभुता से समझौता नहीं करेगा।
आज ही नहीं बल्कि अमेरिका के सामने यही सवाल खड़ा रहता था- भारत झुकता क्यों नहीं? इसका राज छुपा है भारत के कूटनीति की ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ नीति के गर्भ में.- भारत ‘गुट निरपेक्षता’ की आधुनिक परिभाषा पर चलता है – यानी किसी के पाले में नहीं, अपने हित में खड़ा होना। यह नीति स्पष्ट रूप से रूस-यूक्रेन युद्ध, ईरान ऑयल डील, और इजराइल-हमास संघर्ष जैसे मुद्दों पर दिखती है।
आत्मनिर्भर भारत की नींव ने भारत को बुंलदियो पर पहुंचाया- मोदी सरकार की Atmanirbhar Bharat नीति सिर्फ आर्थिक नहीं, बल्कि रणनीतिक स्वाभिमान है। टेक्नोलॉजी, रक्षा, वैक्सीन, अंतरिक्ष, डिजिटल पेमेंट – हर क्षेत्र में आत्मनिर्भरता भारत को वैश्विक दबाव से मुक्त बनाती है। भारत को आत्मबल बनाने का कार्य करती है- घरेलू बाजार की ताकत... जी हाँ. 1.4 अरब की जनसंख्या वाला भारत अब "मांग आधारित" बाजार है। कंपनियां यहां निवेश करने को मजबूर हैं – चाहे अमेरिकी Apple हो या जर्मन BMW। ऐसे में भारत पर व्यापारिक दबाव कारगर नहीं रह जाता।
अमेरिका के खिलाफ भारत की प्रतिक्रिया: मजबूत जवाब से ट्रम्प हैरान है - भारत सरकार ने अमेरिकी दबाव के आगे झुकने से साफ इनकार कर दिया है: भारत ने स्पष्ट किया की ऊर्जा सुरक्षा:- 140 करोड़ लोगों की ऊर्जा आवश्यकताओं को प्राथमिकता देंगे. बाजार आधारित निर्णय: आर्थिक हितों को ध्यान में रखकर आयात नीति बनाएंगे. यूरोप की ओर इशारा करते हुवे : भारत ने कहा कि यूरोपीय देश भी रूसी गैस खरीदते हैं फिर हम क्यों नहीं व्यापार करे.
फिर भी देश के सामने चुनौतियां है- निर्यात पर असर पड़ेंगे : भारतीय उत्पादों की प्रतिस्पर्धा क्षमता घटेगी और व्यापार संतुलन में दिक्कत आएँगी : द्विपक्षीय व्यापार में और गिरावट होंगी. सबसे अधिक उद्योगों पर प्रभाव पड़ेंगे वो है - फार्मा, टेक्सटाइल, और आईटी सेवाओं पर सीधा असर रहेगा.
मात्र चिंतन का विषय यह भी है की क्या हर मोर्चे पर टकराव ही विकल्प है?
✅ भारत का अडिग रहना सराहनीय है, लेकिन — क्या अमेरिका जैसे रणनीतिक साझेदार से संबंधों में खटास देश के दीर्घकालिक हित में है? क्या वैकल्पिक कूटनीतिक मार्गों की संभावना नहीं है, जैसे—ट्रेड डिप्लोमेसी, क्षेत्रीय गठबंधन? कुछ आलोचकों का कहना है कि भारत की “हर चीज़ में आत्मनिर्भर” की नीति कहीं-कहीं व्यापारिक लचीलापन खत्म कर रही है। परन्तु भारत ने बार-बार यह साबित किया है कि वह दबाव में झुकने वाला नहीं है — न 1971 में, न आज। परंतु हर अंतरराष्ट्रीय चुनौती के लिए ताकतवर जवाब देने के साथ-साथ लचीली कूटनीति भी जरूरी है। अमेरिका हो या चीन — संबंधों को संतुलन और सम्मान के आधार पर ही टिकाऊ बनाया जा सकता है।
“भारत झुकता नहीं – क्योंकि वह अपने लोगों, अपने हितों और अपनी संप्रभुता के लिए खड़ा होता है। यह उसकी कमजोरी नहीं, बल्कि रणनीतिक परिपक्वता का परिचायक है।”
भारत आज विश्व मंच पर एक जिम्मेदार, आत्मनिर्भर और आत्मसम्मानी राष्ट्र के रूप में उभर रहा है। अमेरिका जैसे महाशक्ति से टकराने का अर्थ यह नहीं कि भारत आक्रामक है, बल्कि यह उसकी रणनीतिक स्वतंत्रता की घोषणा है। अब सवाल है की भारत क्या जरूरी कदम उठा सकता है? ट्रेड डिप्लोमेसी को मजबूत करना हमरी प्राथमिकता होनी चाहिए- विकल्पीय आपूर्ति चैन (supply chain diversification) कड़ी करनी होंगी- WTO और BRICS जैसे प्लेटफॉर्म पर दबाव का जवाब देना होगा और नई टेक्नोलॉजी और इनोवेशन पर फोकस करना बेहद जरुरी है.
– Indian News Adda संपादकीय टीम
Adv. तुषार पाटील
संपादक
इंडियन न्यूज़ अड्डा
✍️ इंडियन न्यूज़ अड्डा
"तथ्यों के साथ, भावनाओं के पार"
✍ लेखक: Indian News Adda संपादकीय टीम
वैश्विक राजनीति | विदेश नीति | भारत-अमेरिका संबंध
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संदर्भ: Economic Times, 2023 – “India’s inward-looking trade policies under scrutiny”
Bloomberg, 2019 – “India hits back with tariffs on 28 US goods”
भारतीय विदेश नीति का साहसिक मोड़ (MEA Archives, 1971)
The Hindu, May 2022 - “India defends wheat export ban at WTO”
Reuters, Oct 2021 – “India likely to face US sanctions over S-400 deal”



