भक्त का अपमान भगवान को किसी भी हालत में बर्दाश्त नहीं होता- श्यामप्रिया सुश्री मुस्कान शर्मा
भक्त का अपमान भगवान को किसी भी हालत में बर्दाश्त नहीं होता- श्यामप्रिया सुश्री मुस्कान शर्मा
अंबिकापुरी स्थित खाटू श्याम धाम पर चल रहे वार्षिकोत्सव में मायरे की कथा में उमड़ रहा भक्तों का सैलाब-आज गंगा माता का पूजन
इंदौर,। नानीबाई के मायरे की कथा उन लोगों के लिए बहुत बड़ा सबक है, जो बहू को बेटी का दर्जा देने के लिए तैयार नहीं होते हैं। बेटियां भले ही पराया धन मानी जाती हो,उनका रिश्ता अपने पैतृक परिवार से कभी नहीं छूटता। बेटियां ही हैं जो दो परिवारों और दो संस्कृतियों को जोड़ सकती है। भगवान भक्तों को प्रताड़ना से बचाने के लिए स्वयं पहुंच जाते हैं। भक्त का अपमान भगवान को किसी भी स्थिति में बर्दाश्त नहीं होता।
कथा का शुभारंभ विजय कालानी, श्रीमती चंदा अग्रवाल, करुणा शर्मा, गंगा जैन, कुसुमलता सेन, ललिता चावड़ा ने महामंडलेश्वर स्वामी गोपालदास महाराज, महामंडलेश्वर नलिनी दास एवं महामंडलेश्वर कविता दास के सानिध्य में व्यासपीठ के पूजन के साथ किया । महामंडलेश्वर जयेश दास, महामंडलेश्वर ललितादास एवं महामंडलेश्वर मीरा दास ने भी आज मायरे की कथा का श्रवण लाभ उठाया।
महामंडलेश्वर गोपाल दास महाराज ने आज भी यजमानों को विश्व शांति, पर्यावरण संरक्षण एवं पानी की बचत का संकल्प दिलाया। महायज्ञ में 11 यजमान युगल भाग ले रहे हैं। आयोजन समिति की ओर से धीरेंद्र जैसवाल, अनिल सोनी, विनोद विश्वकर्मा, महेश वर्मा, दीपक शर्मा आदि ने सभी मेहमानों की अगवानी की। 7 जून को महोत्सव की पूर्णाहुति पर दिनभऱ अनुष्ठान होंगे।
सुश्री मुस्कान शर्मा ने कहा कि यह कथा केवल पौराणिक कथा नहीं बल्कि समाज के लिए बेटियों के सम्मान का एक प्रेरक संदेश भी है। भगवान ने नानी बाई की प्रतिष्ठा बचाने के माध्यम से बेटियों के निर्मल एवं निश्छल मन की महत्ता भी बताई है। नरसी मेहता को भगवान शिव एवं कृष्ण, दोनों की भक्ति और कृपा प्राप्त हो गई थी। भक्ति का रंग तभी जमता है जब भक्त अपना स्वयं का वजूद भूलने लगे। नरसी मेहता अपने पिता की श्राद्ध की तिथि भी भूल गए थे लेकिन भगवान ने याद रखी और खुद बरसी करने पहुंच गए। भगवान कई बार भक्तों की परीक्षा भी लेते हैं और जब भक्ति डांवाडोल होने लगती है तब उसे दृढ़ता प्रदान करने का काम भी भगवान ही करते हैं। नानी बाई की कथा में पिता और पुत्री के बीच करूणा और स्नेह का अदभुत समन्वय है। यह कथा आज के संदर्भों में भी समाज को बेटियों के सम्मान के लिए प्रेरित करती है।



