कोलकाता गैंगरेप: सवाल अब भी बाकी हैं...

कोलकाता गैंगरेप: सवाल अब भी बाकी हैं...

कोलकाता गैंगरेप: सवाल अब भी बाकी हैं...

 कोलकाता गैंगरेप: सवाल अब भी बाकी हैं...
"जिस समाज में एक महिला सुरक्षित नहीं, उस विकास का क्या मूल्य?"

✒️ लेख: कलम का सिपहसालार एवं Indian News Adda टीम
कोलकाता में हाल ही में हुई गैंगरेप की घटना ने एक बार फिर हमारे सभ्य कहलाने वाले समाज का क्रूर चेहरा उजागर कर दिया है। चिल्लाती है वो चीखें, गूंजता है शहर का मौन… और फिर वही घिसे-पिटे बयान, वही मोमबत्तियाँ और कुछ दिन बाद फिर वही शांत समाज!  लेकिन सवाल यह है कि — क्या हम अब भी सिर्फ घटना के बाद रोने वाले समाज बनकर रह गए हैं?

घटना के बाद सवाल नहीं, पहले क्यों नहीं चेतते?
हर बलात्कार के बाद हम पूछते हैं: "सरकार क्या कर रही है?"
"पुलिस कहाँ थी?"  "सीसीटीवी क्यों नहीं था?"
पर क्या हमने कभी यह पूछा है — "हमने अपने बेटों को क्या सिखाया?"
या  "हमने समाज में स्त्री को कब इंसान माना?"
यह सिर्फ कानून का नहीं, मानसिकता का अपराध है।

ऐसी घटनाएं बार-बार क्यों होती हैं?
कोलकाता हो, मथुरा हो या हैदराबाद — जगहें बदलती हैं, पर निर्भया हर बार बदलकर लौटती है।  कारण क्या हैं?
न्याय में देरी: अपराधी जानते हैं कि सालों तक कुछ नहीं होगा।
राजनीतिक चुप्पी: हर सरकार घटना पर “शोक” तो व्यक्त करती है, पर सख्त कदम नहीं। पितृसत्ता की जड़ें: आज भी लड़कियों को ‘चरित्र’ और लड़कों को ‘छूट’ दी जाती है। भय का अभाव: जब कानून से डर नहीं, तो अपराध ही 'साहस' बन जाता है।

समाज कितना दोषी है?
अगर एक रेप समाज की नाकामी है, तो लगातार हो रहे गैंगरेप पूरे समाज का सामूहिक अपराध हैं।  क्या आपने कभी सड़क पर किसी लड़की के साथ हो रही छींटाकशी पर हस्तक्षेप किया?  क्या आप अपने मित्रों की अश्लील बातों पर चुप रहे?
क्या आपने ‘लड़की ने क्या पहना था’ वाला जुमला दोहराया?  तो आप भी दोषी हैं, हम सब दोषी हैं।

सरकार क्या सिर्फ दोषी है या असंवेदनशील भी?
क्या हर राज्य सरकार के पास फास्ट ट्रैक कोर्ट्स हैं?  क्या पुलिस ट्रेनिंग में संवेदनशीलता सिखाई जाती है? क्या बलात्कार पीड़िता के लिए पुनर्वास की कोई ठोस योजना है? अगर इनका उत्तर 'नहीं' है —  तो सरकार सिर्फ विफल नहीं, बल्कि असंवेदनशील भी है।

आगे क्या करें? सिर्फ विरोध या बदलाव भी? अब ज़रूरत है:  लिंग-संवेदनशील शिक्षा स्कूलों में। कड़े कानून और शीघ्र न्याय।
मीडिया की संवेदनशीलता।  सोशल मीडिया ट्रायल की रोकथाम।  बेटियों की नहीं, बेटों की परवरिश बदलने की।  अंत में: इस बार कोलकाता की बेटी चुप है —
पर क्या हम भी चुप रहेंगे?

"हर बार बस मोमबत्तियाँ क्यों जलती हैं? इंसानियत क्यों नहीं?"
1️⃣ हर घटना के बाद रोते हैं,
पर कभी रोकने की पहल नहीं करते।
2️⃣ कानून की देरी,
राजनीति की चुप्पी,
और समाज की असंवेदनशीलता —
यही कारण हैं इन घटनाओं के दोहराव के।
3️⃣ लड़की का चरित्र मत देखो,
लड़कों की परवरिश देखो।
4️⃣ सरकार सिर्फ निंदा न करे,
फास्ट ट्रैक कोर्ट, पुलिस रिफॉर्म और पीड़िता पुनर्वास की ठोस योजना लाए।
5️⃣ समाज दोषी है,
अगर वो चुप है।
अब आवाज़ उठाओ —
हर बेटी के लिए एक सुरक्षित भारत चाहिए।

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(कलम का सिपहसालार एवं Indian News Adda टीम)