प्रेम ही पांचवां पुरुषार्थ, जहां धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष भी हो जाते हैं उसके अधीन
*प्रेम ही पांचवां पुरुषार्थ, जहां धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष भी हो जाते हैं उसके अधीन*
*इन्द्रेश जी महाराज ने समझाया माधुर्य भाव का महत्व, कथा में हुआ दीपउत्सव का आयोजन*
इंदौर। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के बाद जीवन का पांचवां पुरुषार्थ प्रेम है। जब व्यक्ति प्रेम के भाव में डूब जाता है, तब ये चारों पुरुषार्थ भी उसके अधीन हो जाते हैं। श्रीमद्भागवत कथा के पांचवें दिन इन्द्रेश जी महाराज ने यह बात कही। उन्होंने बताया कि श्रीमद्भागवत की रचना का उद्देश्य केवल धर्म और मोक्ष का ज्ञान देना नहीं, बल्कि भगवान के प्रति प्रेम का भाव जगाना भी है। भागवत कथा का पांचवा दिन हिंदी व्हाट्सएप का भाव है आयोजन किया गया जहां पर मंच को 200 से अधिक दीपों से सजाया गया। कान्हा के अलग-अलग रूपों को विभिन्न छंदों में बड़ी खूबसूरती से सुनाया गया।
* दीपों से सजा मंच, भजन-कीर्तन पर झूमे श्रद्धालु*
कथा में दीपोत्सव उल्लास के साथ मनाया गया। पूरे मंच को दीपकों से सजाया गया, जिससे माहौल भक्तिमय हो गया। भजन-कीर्तन की धुनों पर श्रद्धालु नृत्य करते नजर आए। ठाकुरजी के जन्म के बाद उनके बाल रूप की लीलाओं को भी उत्सव में दर्शाया जा रहा है। इसी भाव के साथ मंच पर ठाकुरजी की दुकान सजाई गई, जिसने श्रद्धालुओं का ध्यान खींचा। दीपों की रोशनी, भजनों की गूंज और भक्तों के नृत्य से पूरा वातावरण आनंद और भक्ति के रंग में रंग गया।
यजमान श्री आशीष गोयल ने बताया कि दीपोत्सव का उद्देश्य कथा के प्रसंगों को श्रद्धालुओं के लिए जीवंत बनाना है। ठाकुरजी के जन्म के बाद उनकी बाल लीलाओं और जीवन से जुड़े प्रसंगों को उत्सव के रूप में सजाया जा रहा है। इसी भाव से मंच पर दीप सजाए गए और ठाकुरजी की दुकान भी तैयार की गई। भजन-कीर्तन पर श्रद्धालुओं को झूमते और भक्ति में डूबते देखना पूरे आयोजन की खास बात रही।
*भागवत केवल भगवान की कथा नहीं*
इन्द्रेश जी महाराज ने कहा कि वेदव्यास जी ने अनेक ग्रंथों की रचना की, फिर भी उनका मन अशांत था। नारदजी ने उन्हें समझाया कि धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की चर्चा तो ग्रंथों में हुई, लेकिन पांचवें पुरुषार्थ प्रेम का पर्याप्त वर्णन नहीं हुआ। इसके बाद श्रीमद्भागवत की रचना हुई। महाराज ने कहा कि भागवत केवल भगवान की कथा नहीं, उनके भक्तों के चरित्र और प्रेम की कथा भी है। इसे सुनने का उद्देश्य सिर्फ ज्ञान जुटाना नहीं, बल्कि उसके भाव को जीवन में उतारना है।
*गोवंश की रक्षा के लिए देशभर में अभियान, 7 करोड़ से ज्यादा लोगों ने किए हस्ताक्षर*
गोवंश की रक्षा और संरक्षण के लिए देशभर के संतों के साथ मिलकर एक साल से अभियान चलाया जा रहा है। इसके दो चरण पूरे हो चुके हैं, जिनमें 5100 तहसीलों तक पहुंचकर 7 करोड़ से ज्यादा लोगों के हस्ताक्षर कराए गए और गायों की रक्षा का निवेदन किया गया। अभियान का उद्देश्य देश में बचे करीब 8 करोड़ गोवंश को सुरक्षित रखना है। 27 जुलाई को देश के 790 जिलों में अभियान के तहत गतिविधियां हुईं। अब इसे फिर से देशभर की राजधानियों में आयोजित किया जाएगा। इसी क्रम में 4 दिसंबर को भोपाल में कार्यक्रम होगा।
*ब्रज में भगवान से ज्यादा उनके माधुर्य भाव की प्रधानता*
महाराज ने ब्रज की एक बुजुर्ग महिला का प्रसंग सुनाते हुए बताया कि उनकी निष्ठा वृंदावन और किशोरीजी के प्रति इतनी गहरी थी कि द्वारिका से लौटे एक रिश्तेदार से भी उन्होंने संबंध तोड़ लिए थे। महाराज ने स्पष्ट किया कि यह प्रसंग किसी को ऐसा व्यवहार करने की सीख देने के लिए नहीं, बल्कि भक्ति में अलग-अलग भावों की गहराई समझाने के लिए है। उन्होंने कहा कि ब्रज की गोपियों के लिए कृष्ण केवल भगवान नहीं, उनके प्रियतम हैं। उनके लिए ईश्वर की शक्ति और ऐश्वर्य से ज्यादा महत्वपूर्ण उनके साथ प्रेम का संबंध है।
*प्रेम में अपनी पीड़ा नहीं, प्रियतम की प्रसन्नता जरूरी*
महाराज ने कहा कि माधुर्य भाव में भक्त अपनी परेशानी भगवान के सामने रखने के बजाय उनके साथ सहज और प्रसन्न रहने का भाव रखता है। उन्होंने गोपियों के प्रेम का उदाहरण देते हुए बताया कि उनके लिए कृष्ण का साथ ही सब कुछ था। प्रेम में हर बात का तर्क या कारण नहीं खोजा जाता। जहां हर संबंध के पीछे कोई वजह या अपेक्षा हो, वहां आकर्षण, मोह या प्रीति हो सकती है, लेकिन प्रेम का भाव इससे अलग है।


