खजराना गणेश मन्दिर पर चल रहे नर्मदा चिंतन ज्ञान यज्ञ में परिक्रमावासी आचार्य शास्त्री ने बताई माँ नर्मदा की महिमा
नर्मदा का कंकर-कंकर बन जाता है शंकर.....!
खजराना गणेश मन्दिर पर चल रहे नर्मदा चिंतन ज्ञान यज्ञ में परिक्रमावासी आचार्य शास्त्री ने बताई माँ नर्मदा की महिमा
इंदौर। भगवान शंकर से माँ नर्मदा का बहुत गहरा सम्बन्ध है। नर्मदा की सबसे बड़ी महत्ता तो यही है कि इसका प्रत्येक कंकर ‘शंकर’ बन जाता है। जब भगवान शिव मेकल पर्वत पर गहरी तपस्या में लीन थे, तब उनके शरीर से निकली ऊर्जा और पसीने की बूंदों से एक पवित्र जल कुंड बना और उसी कुंड से जो दिव्य कन्या प्रकट हुई, उसी का नाम नर्मदा रखा गया। नर्मदा का शाब्दिक अर्थ होता है सुख देने वाली। यह देश की ऐसी जीवन रेखा है जो सुख, शांति और आनंद का स्त्रोत मानी जाती है। नर्मदा किनारे किया गया जप, तप और ध्यान कई गुना अधिक फलदायी माना गया है। माँ नर्मदा आस्था, भक्ति और ऊर्जा का अनूठा संगम है।
ये दिव्य विचार हैं नर्मदा परिक्रमावासी आचार्य पं. रविकांत शास्त्री के, जो उन्होंने शहर में पहली बार खजराना गणेश मन्दिर स्थित सत्संग सभागृह पर अ.भा. दादा गुरु परिवार इंदौर नर्मदा मिशन की मेजबानी में प्रारम्भ हुए 7 दिवसीय नर्मदा चिंतन ज्ञान यज्ञ के शुभारंभ सत्र में व्यक्त किए। कथा शुभारंभ के पूर्व अ.भा. दादागुरु परिवार इंदौर नर्मदा मिशन की ओर से राजेंद्र बंसल, नित्यम बंसल, संजय शर्मा, नारायण अग्रवाल, देवांग शर्मा, कैलाश बंसल, अनिल अग्रवाल, हर्ष जैन, नितिन अग्रवाल, स्वप्निल, अजय अग्रवाल, हरजीत मल्होत्रा आदि ने व्यास पीठ का पूजन किया। मातृशक्ति की ओर से ज्योति बंसल, प्रेरणा बंसल सहित सैकड़ों महिलाओं ने परिक्रमावासी आचार्य पं. रविकांत शास्त्री की अगवानी की। कथा श्रवण के लिए बड़ी संख्या में नर्मदा भक्त, परिक्रमावासी और नर्मदा तट स्थित धर्मस्थलों के संत-महंत भी आ रहे हैं। देश के तपोनिष्ठ संत दादागुरु भी इस पावन कथा को सानिध्य प्रदान करने 9 से 11 मई तक रहंगे। वे देश के एकमात्र ऐसे तपस्वी संत हैं जो पिछले 2029 दिनों से केवल नर्मदा के जल पर आश्रित हैं। कथा 11 मई तक खजराना गणेश मंदिर परिसर स्थित दौलतराम छाबछरिया सत्संग भवन पर प्रतिदिन शाम 5 से 8 बजे तक हो रही है।
आचार्य रविकांत शास्त्री ने बहुत सुन्दर और सरल शब्दों में माँ नर्मदा की महत्ता बताते हुए कहा कि गंगा में स्नान करने से पापों का नाश होता है जबकि नर्मदा के तो दर्शन मात्र से ही व्यक्ति के पापों का शमन हो जाता है। यदि पूरी श्रद्धा और आस्था से माँ नर्मदा का स्मरण, पूजन, दर्शन और आचमन किया जाए तो व्यक्ति के जीवन के सभी तरह के कष्ट दूर हो जाते हैं। नर्मदा का कंकर-कंकर शंकर बन जाता है। नर्मदा के प्रत्येक कंकर को नर्मदेश्वर महादेव कहा जाता है। इसीलिए लोग घरों में नर्मदा से लाए गए शिवलिंग की पूजा करते हैं। इसका प्रत्येक तट तपोभूमि माना गया है। प्राचीन समय से ही नर्मदा के सभी तट हमारे ऋषि मुनियों की तपस्थली रहे हैं। इनमें अगस्त्य, अत्रि, भृगु, भारद्वाज और मार्कण्डेय जैसे नाम प्रमुख हैं जिन्होंने नर्मदा के तट पर कई बरसों तक तपस्या की और इसीलिए नर्मदा के सभी तटों को तपोभूमि कहा जाता है। नर्मदा की परिक्रमा केवल यात्रा नहीं, आत्म शुद्धि, तपस्या और आध्यात्मिक जागरण का प्रवेश द्वार है।
संयोजक राजेंद्र बंसल एवं नित्यम बंसल ने बताया कि कथा में गुरुवार 7 मई को माँ भगवती नर्मदा के प्राकट्य उत्सव, 8 को अनेक कल्पों में माँ नर्मदा की लीलाओं का वर्णन, 9 को माँ नर्मदा की परिक्रमा की महिमा, 10 को नर्मदा तट के तीर्थों का वर्णन और सोमवार 11 मई को तपोनिष्ठ संत अवधूत श्री दादागुरु भगवान के आशीर्वचन, दर्शन के पश्चात महाप्रसादी का आयोजन होगा। दादागुरु भगवान रविवार 10 मई को भी कथा में पावन सानिध्य प्रदान करेंगे।


