लोकतंत्र के सेनानियों को नमन: इंदौर में जुटा 'जज्बा', याद आया आपातकाल का वो काला दौर

लोकतंत्र के सेनानियों को नमन: इंदौर में जुटा 'जज्बा', याद आया आपातकाल का वो काला दौर

लोकतंत्र के सेनानियों को नमन: इंदौर में जुटा 'जज्बा', याद आया आपातकाल का वो काला दौर

इंदौर,। 1975 के आपातकाल की यातनाएं झेलने वाले देश के कोने-कोने से आए लोकतंत्र सेनानियों (मिसाबंदियों) और उनके परिजनों के आंसुओं, स्मृतियों और देशभक्ति के नारों से रविवार को खंडवा रोड स्थित 'अखंड परम आश्रम' गूंज उठा। अवसर था—आपातकाल के पांच दशक पूरे होने पर आयोजित ऐतिहासिक 'लोकतंत्र सेनानी सम्मान समारोह' का।

ढलती उम्र और चेहरों पर झुर्रियों के बावजूद देश सेवा का जज्बा लिए मध्यप्रदेश, गुजरात, राजस्थान और दिल्ली के 1000 से अधिक लोग इस महामिलन के साक्षी बने। वरिष्ठ समाजसेवी व आयोजन समिति के अध्यक्ष रामबाबू अग्रवाल के प्रयासों से यह गरिमामयी आयोजन संपन्न हुआ।

 "संविधान की रक्षा ही सच्ची श्रद्धांजलि"

थावरचंद गहलोत, मुख्य अतिथि एवं राज्यपाल, कर्नाटक

"1975 का आपातकाल भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का काला अध्याय था। उस दौर में मौलिक अधिकारों का हनन हुआ और मीडिया पर अंकुश लगा। ऐसे समय में लोकतंत्र की रक्षा के लिए संघर्ष करने वाले सेनानियों का त्याग आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणास्रोत है। संविधान की रक्षा करना ही इन्हें सच्ची श्रद्धांजलि होगी।"

सत्यनारायण जटिया (पूर्व केंद्रीय मंत्री): "लाखों लोगों ने जेल की यातनाएं सहीं, परिवारों से दूर रहे, लेकिन लोकतांत्रिक मूल्यों से समझौता नहीं किया। नई पीढ़ी को इस इतिहास से परिचित कराना बेहद जरूरी है।"

पंडित रामकृष्ण शर्मा (101 वर्षीय स्वतंत्रता संग्राम सेनानी व पूर्व सांसद): "उस दौर की पीड़ा को सिर्फ इतिहास की किताबों तक सीमित न रखें। लोकतंत्र सेनानियों के अनुभव समाज की नई पीढ़ी तक पहुंचने चाहिए।"

कृष्णमुरारी मोघे (पूर्व महापौर): "इस संघर्ष का उद्देश्य नई पीढ़ी को यह बताना है कि नागरिक स्वतंत्रता की रक्षा के लिए लोगों ने किस तरह व्यक्तिगत कठिनाइयों का सामना किया।"

 विशेष आकर्षण: चित्र प्रदर्शनी ने ताजा किए जख्म समारोह स्थल पर लगाई गई एक विशेष चित्र प्रदर्शनी आकर्षण का केंद्र रही, जिसे देखकर कई सेनानी और उनके परिवार भावुक हो गए।

क्या था प्रदर्शनी में: आपातकाल के दौरान लगे प्रतिबंध, नागरिक अधिकारों का हनन, जन-आंदोलन, जेल जीवन और उस दौर के चर्चित स्लोगन।

श्रद्धांजलि: दिवंगत लोकतंत्र सेनानियों—पं. रामनारायण शास्त्री, विष्णु प्रसाद शुक्ला, कमल सचदेवा, श्रीवल्लभ शर्मा, जादवचंद जैन, नारायण धाम, कृष्ण कुमार अस्थाना, फूलचंद वर्मा और जयकृष्ण गौड़ के चित्रों के समक्ष उपस्थित जनसमुदाय ने भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की।

 युवा पीढ़ी को संदेश: संस्कृति और पर्यावरण का संगम

आयोजन समिति के अध्यक्ष रामबाबू अग्रवाल ने बताया कि कार्यक्रम की शुरुआत केवल भाषणों से नहीं, बल्कि धरातल पर संदेश देकर की गई:

 गौ-सेवा: सुबह 10 बजे सनातन संस्कृति के प्रतीक गौ माता की सेवा के साथ कार्यक्रम का आगाज हुआ। पौधारोपण: पर्यावरण संरक्षण का संकल्प लेते हुए बड़े पैमाने पर पौधारोपण किया गया, ताकि युवा पीढ़ी संस्कृति और प्रकृति के प्रति अपनी जिम्मेदारी समझे।

अतिथि स्वागत राजेश अग्रवाल, गणेश अग्रवाल, आदित्य शर्मा, छोटू शुक्ला, मोहन ढाकुनिया, राहुल परिहार, दिनेश अग्रवाल

शॉल और श्रीफल से सम्मानित होते ही सेनानियों की आंखें छलक आईं। लगभग तीन घंटे चले इस समारोह में 'भारत माता की जय' और 'वंदे मातरम' के नारों से पूरा आश्रम परिसर देशभक्ति के रंग में सराबोर रहा। जय गुरुदेव परिवार के कमलेश्वर सिंह सिसोदिया सहित कई सामाजिक संस्थाओं के पदाधिकारी भी इस अवसर पर मौजूद रहे।