भक्ति में पवित्रता और श्रेष्ठता का भाव होना चाहिए – पं. मुखिया

भक्ति में पवित्रता और श्रेष्ठता का भाव होना चाहिए – पं. मुखिया

भक्ति में पवित्रता और श्रेष्ठता का भाव होना चाहिए – पं. मुखिया

दशा नीमा समाज के हीरक जयंती महोत्सव पर मालगंज स्थित नवश्रृंगारित धर्मशाला पर चल रहे भागवत ज्ञान यज्ञ में प्रेरक आशीर्वचन

इंदौर। भगवान और भक्ति की प्राप्ति के तीन प्रमुख साधन, श्रवण, कीर्तन और नाम स्मरण बताए गए हैं। इन तीनों साधनों में हमारा कोई धन खर्च नहीं होता। हमारी भक्ति भगवान के साथ छल करने जैसी है। हम जैसे बीज बोएंगे, फल भी वैसे ही मिलेंगे। भगवान के यहां भी हम जैसा अर्पित करेंगे, वैसा ही हमें भी वापस मिलेगा। यह नहीं समझें कि कोई हमें देख नहीं रहा है। सूर्य, चंद्रमा, तारे और नक्षत्र हमारे कर्मों पर निगरानी रखते हैं, इसलिए अपने कर्मों, विशेषकर भक्ति में पवित्रता और श्रेष्ठता का भाव होना चाहिए। इनके बिना भक्ति का सृजन संभव नहीं है। भागवत पुराण यही संदेश देने वाला दुनिया का अनुपम ग्रंथ है।

 ये दिव्य विचार हैं बुरहानपुर के प्रख्यात भागवताचार्य पं. आदित्य मुखिया के, जो उन्होंने सोमवार को श्री दशा नीमा पंचायत ट्रस्ट द्वारा मालगंज चौराहा स्थित नवश्रृंगारित धर्मशाला भवन पर ट्रस्ट के हीरक जयंती महोत्सव एवं पुरुषोत्तम मास के उपलक्ष्य में चल रहे भागवत कथा ज्ञान यज्ञ में व्यक्त किए। कथा शुभारंभ के पूर्व सुशील नीमा, अनिल नीमा, महेश नीमा गामा, अजय जोहरी आदि ने व्यास पीठ का पूजन किया। विद्वान वक्ता की अगवानी सत्यनारायण नीमा, मंत्री कमल नीमा, राजेंद्र नीमा, सतीश नीमा मालक, गिरधर गोपाल नीमा, अशोक महेश नीमा आदि ने की। समाज की विभिन्न संस्थाओं की ओर से भी व्यास पीठ का पूजन किया। इस अवसर पर समाजसेवा कोष समिति, दशा नीमा मंडल, प्रगति मंच, युवा मंच, युवान यमुना मंडल, विकास संगठन सहित विभिन्न संगठनों के पदाधिकारी उपस्थित थे। संयोजक सतीश नीमा मालक ने बताया कि कथा प्रतिदिन शाम 4 से 7 बजे तक होगी।  

 भागवताचार्य पं. मुखिया ने कहा कि हम कथा में तो रोज आकर बैठते है, लेकिन हमारा मन संसार और अन्य स्थानों पर मचलता रहता है। कथा श्रवण करते समय श्रद्धा का भाव जरूरी है। भगवान के चरित्र और कथा का श्रवण सावधानी से करना चाहिए। हम रोज मंदिर जाने के बाद भी यदि भक्ति का सृजन नहीं कर सकें और अपने आचरण में दया, करुणा और परमार्थ का भाव नहीं ला सकें तो ऐसा मंदिर जाना व्यर्थ ही माना जाएगा। कथा श्रवण के बाद हम अपने कर्मों को थोड़ा सा भी सुधार लें तो हमारा श्रवण सार्थक हो जाएगा। भागवत केवल ग्रंथ नहीं, जीवन को श्रेष्ठ अलंकरणों रूपी संस्कारों से सजाने और संवारने का खजाना है।