साहित्य गोष्ठी में पर्यावरण से प्यार पावस की मनुहार " जल ही कल जल ही जीवन सत्य कब समझना है"

साहित्य गोष्ठी में पर्यावरण से प्यार पावस की मनुहार " जल ही कल जल ही जीवन सत्य कब समझना है"

साहित्य गोष्ठी में पर्यावरण से प्यार पावस की मनुहार
" जल ही कल जल ही जीवन सत्य कब समझना है"

स .ना .मंगल    सीईपीआरडी (पर्यावरण संरक्षण अनुसंधान विकास केंद्र)

 इंदौर । 46वीं मासिक साहित्य गोष्ठी में वर्षा की फुहारों के बीच "पर्यावरण ".स्थाई चिंतन बना रहा .संस्था उपाध्यक्ष डॉ अनिल भंडारी ने स्वागत संबोधन दिया एवं पर्यावरण चर्चा की .कार्यक्रम संयोजक  सत्यनारायण मंगल ने गोष्ठी का सफल संचालन किया .
           .डॉ. कृष्ण जोशी ने ईश वंदना की और  रचना पढ़ी--" यह बारिश ही सिखाती है कि गिर के भी मुस्कुराया जा सकता है "..श्री ओम उपाध्याय ने खंड वर्षा का कारण बताया --- "मेघों का इसमें दोष नहीं दूषित पर्यावरण है जिम्मेदार ." 
      पवन सोलंकी भी चिंतित रहे--" उमस दुपहरी और रात ,जीवन हर पल कहता कब होगी बरसात" . डॉ .पूजा कृष्ण ने स्वर् मिलाया -- " है वर्षा रितु किंतु सूरज उगले आग ,गुम है सावन का राग."                      अनिल ओझा आशावान रहे --" गगन घटा गहराती अमृत रस बरसाती , निशा तमस की दूर ,भोर मनोहर लाती ". सुधीर लोखंडे प्रसन्न दिखे--" वर्षा के बादल कुछ यूं छा रहे, धड़कते हृदय को धड़का रहे ."
  ओ. जोशी बब्बू के शेर --"गूंजेगी जो सभा में वाह-वाह आवाज़ें, तो बिन बादलों के भी बरसात होगी" पर खूब दादा मिली . शायर श्री रशीद अ. शेख ने प्रकृति चित्रण किया -- " रूप बदलती सृष्टि में प्रकृति चिंरतन नित्य , कभी मनोहर चंद्रमा कभी प्रखर आदित्य" 
            अरुण अपेक्षित ने आत्म प्रशंसा पर यूं व्यंग्य किया --" हम भी खड़े हैं पंक्ति में सम्मान कीजिए  थोड़ा सा ध्यान हम पर श्रीमान दीजिए ."  डॉ बासिफ काज़ी ने आईना दिखाया --"नफरतों को जो रिहाई दे रहा है, शख्स वही मुझे मोहब्बत की दुहाई दे रहा है ."
             डॉ .इसरार मो. ने भाव जगाए --"आधी रात बीत गई लाल नहीं आया बेटे की अनुपस्थिति ने मां को रुलाया .".श्री महेंद्र सांघि व्यथित हुए --" बहती थी दूध की नदियां देश में पानी के टोटे हैं ,पौधे लगाने के कम काटने के अधिक मौके हैं ".अशोक गर्ग का दोहा था --" कर्म दिए जो तूने अच्छे कभी नहीं पछताएगा ,जाने कौन रूप में आकर राम तुझे मिल जाएगा ."
            दिनेश दवे ने स्मरण कराया -" पर्यावरण को जितना सवारू उतना है कम ,नदिया हो रही प्रदूषित बेरहमी से कट रहे वन" . सुब्रतो बोस ने विरही की व्यथा बांग्ला स्वर में गाई --" मेघा कहां जाए रे ,अकेला कहां जाए रे ."  राजेश तिवारी की भी शिकायत रही --" घनन घनन घन छाए बादर बिन बरसे ही क्यों जाए बादर . कमल ने प्राकृतिक जीवन बिताने का आह्वान किया .     
             अरविंद जोशी ने गंभीरता से स्पष्ट किया --- -"समंदर में मिल जाने के बाद कतरा कतरा नहीं रहता, मौत के बाद कोई खतरा खतरा नहीं रहता" .डॉ. स्वाति सिंह ने कटाक्ष किया --" केमिकल से फर्श सफाई मिट्टी को जहर पिलाते हैं सीमेंट से मिट्टी का दम घोट पर्यावरण दिवस मनाते हैं ."
            अंत में संचालक सत्यनारायण मंगल ने जल स्रोतों के प्रति संवेदना व्यक्त की __"अपना तो सर्वस्व लुटाकर सागर में जीवन अंत किया ,जीवन भर विषपान कर सदा जीवनदाई पय दिया ,फिर भी नाशुक्रे बन पग पग इनको छलना है, जल ही कल जल ही जीवन "सत्य" कब समझना है ."
    ......अंत में बड़ी संख्या में उपस्थित साहित्यकारों का  दिनेश जिंदल ने आभार प्रकट किया.