टैक्स ऑडिट में अब छोटी चूक भी पड़ सकती है भारी, ₹1.50 लाख तक की पेनल्टी पर भी उठे कानूनी सवाल*

टैक्स ऑडिट में अब छोटी चूक भी पड़ सकती है भारी, ₹1.50 लाख तक की पेनल्टी पर भी उठे कानूनी सवाल*

*टैक्स ऑडिट में अब छोटी चूक भी पड़ सकती है भारी, ₹1.50 लाख तक की पेनल्टी पर भी उठे कानूनी सवाल*

मध्य प्रदेश टैक्स कंसल्टेंट्स एसोसिएशन  (एमपीटीसीए) इंदौर ज़ोन के सेमिनार में नई टैक्स ऑडिट व्यवस्था की बारीकियां समझीं, विशेषज्ञों ने कहा; रिपोर्ट फाइनल करने से पहले हर क्लॉज और डेटा का करें मिलानl 

इंदौर-  टैक्स ऑडिट अब केवल खातों की जांच और फॉर्म  3 सीडी भरने की औपचारिकता नहीं रह गया है। जीएसटी, टीडीएस, एआईएस, 26 एएस और वित्तीय विवरणों में दिखाई देने वाले आंकड़ों के बीच मामूली अंतर भी रिपोर्टिंग का विषय बन सकता है। वहीं, टैक्स ऑडिट रिपोर्ट में देरी पर ₹1.50 लाख तक की पेनल्टी के प्रावधान ने करदाताओं और टैक्स प्रोफेशनल्स के सामने इसकी कानूनी वैधता और रीजनेबल कॉज जैसे महत्वपूर्ण सवाल खड़े किए हैं। इन्हीं व्यावहारिक और कानूनी पहलुओं पर मध्य प्रदेश टैक्स कंसल्टेंट्स एसोसिएशन  इंदौर ज़ोन के विशेष सेमिनार में विशेषज्ञों ने गहन मंथन किया।

मुख्य वक्ता एवं अहमदाबाद से आए सीए पलक पावागढ़ी ने "नई टैक्स ऑडिट व्यवस्था एवं व्यावहारिक रिपोर्टिंग की बारीकियाँ” विषय पर टैक्स ऑडिट की बदलती प्रकृति और रिपोर्टिंग की बारीकियों पर विस्तृत मार्गदर्शन दिया। उन्होंने कहा कि टैक्स ऑडिट रिपोर्ट को अंतिम रूप देने से पहले केवल बुक्स ऑफ एकाउंट्स की जांच पर्याप्त नहीं है, बल्कि उपलब्ध विभिन्न स्रोतों से प्राप्त आंकड़ों का आपसी मिलान और उनके बीच अंतर का उचित विश्लेषण भी आवश्यक है।

उन्होंने विशेष रूप से असेसमेंट ईयर 2026-27 के टैक्स ऑडिट को लेकर महत्वपूर्ण व्यावहारिक बिंदुओं पर चर्चा की। उन्होंने बताया कि ऑडिटर को टर्नओवर/ग्रॉस रिसीप्ट का बुक्स, जीएसटी रिटर्न, टीडीएस डाटा, एआईएस एवं अन्य उपलब्ध सूचनाओं से रिकांसिलिएशन करना चाहिए। इसी प्रकार फॉर्म 3सीडी  की प्रत्येक एप्लीकेबल क्लॉज़ की स्वतंत्र रूप से समीक्षा करना जरूरी है और केवल पिछले वर्ष की रिपोर्ट को कॉपी फॉरवर्ड् करने से बचना चाहिए।

फॉर्म 3CD में डिस्क्लोज़र अब ज्यादा महत्वपूर्ण

सीए पावागढ़ी ने सेक्शन 43बी के अंतर्गत लिएबिलिटीज़ एवं सब्सिक्वेंट पेमेंट, एमएसएमई ड्यूस, टीडीएस/टीसीएस कम्प्लायंस, कॅश ट्रांसेक्शन्स, सेक्शन 269एसएस , 269एसटी एवं 269टी से जुड़े ट्रांससेशन्स, डेप्रिसिएशन, फिक्स्ड एसेट, पार्टनर रेम्यूनरेशन एवं इंटरेस्ट तथा रिलेटेड पार्टी ट्रांसेक्शन की सावधानीपूर्वक समीक्षा पर जोर दिया।

उन्होंने कहा कि जीएसटी टर्नओवर और बुक्स के टर्नओवर के बीच अंतर, एआईएस एवं 26एएस में उपलब्ध इनफार्मेशन तथा बुक्स में दर्ज फिगर्स के बीच मिसमैच को भी कारण सहित ऐनालाइज करना चाहिए। किसी भी क्वालिफिकेशन, एडवर्स ऑब्ज़र्वेशन या मटेरियल इन्कन्सीस्टेंटी को स्पष्ट और तथ्यात्मक रूप से रिपोर्ट किया जाना चाहिए।

उन्होंने टैक्स ऑडिट रिपोर्ट फाइनल करने से पहले पैन, असेसमेंट ईयर, एप्लीकेबल ऑडिट फॉर्म, मेम्बरशिप डिटेल्स, डीएससी, यूडीन तथा फाइलिंग पर्टिक्युलर्स  की अंतिम स्तर पर जांच को भी महत्वपूर्ण बताया। उनके अनुसार टैक्स ऑडिट का उद्देश्य केवल प्रेसक्राइब्ड फॉर्म्स को भरना नहीं, बल्कि करदाता की वास्तविक टैक्स पोज़िशन को सही, ट्रांसपेरेंट और एविडेंस बेस्ड तरीके से रिपोर्ट करना है।

₹1.50 लाख की पेनल्टी—क्या हर देरी पर लगेगी?

दूसरे तकनिकी सत्र में  वरिष्ठ अधिवक्ता एवं सीए सुमित नेमा ने "लीगल वैलिडिटी ऑफ़ पेनल्टी अप टू “₹1.50 Lakh फॉर डिले इन टैक्स ऑडिट” विषय पर कानूनी पहलुओं को विस्तार से समझाया।

उन्होंने बताया कि इनकम टैक्स एक्ट, 1961 के सेक्शन 271बी  के अंतर्गत टैक्स ऑडिट रिपोर्ट में निर्धारित समय के भीतर ऑडिट करवाने अथवा रिपोर्ट फर्निंश करने में डिफ़ॉल्ट की स्थिति में पेनल्टी का प्रावधान है। 
हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि पेनल्टी  का प्रावधान होना और प्रत्येक डिलेड कॉज में स्वतः पेनल्टी लग जाना एक समान बात नहीं है। किसी मामले में पेनल्टी की वैधानिकता निर्धारित करते समय फैक्ट्स एंड सर्कमस्टान्सेस, डिले का वास्तविक कारण तथा करदाता द्वारा प्रस्तुत एक्सप्लनेशन का परीक्षण आवश्यक है।

रीजनेबल कॉज का होगा महत्वपूर्ण रोल

सुमित नेमा ने सेक्शन 273बी के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि जहां कानून में रीजनेबल कॉज का स्टेट्यूटरी डिफेंस उपलब्ध है, वहां पेनल्टी प्रोसीडिंग्स में यह देखना जरूरी है कि देरी का कारण वास्तविक, उचित और परिस्थितियों के अनुरूप था या नहीं।

उन्होंने कहा कि पेनल्टी की वैलिडिटी परखते समय यह भी देखना चाहिए कि—

*क्या करदाता वास्तव में टैक्स ऑडिट के लिए लाइबल था?
* क्या ऍप्लिकेबल ड्यू डेट का सही निर्धारण किया गया था?
* ऑडिट रिपोर्ट वास्तव में कब फर्निश की गई और डिले कितनी अवधि का था?
* पेनल्टी सही टर्नओवर/ग्रॉस रिसीप्ट के आधार पर की गई है या नहीं?
* डिले का वास्तविक और डॉक्युमेंटेड कारण क्या था?
* क्या करदाता ने ऑडिटर को समय पर आवश्यक बुक्स और इनफार्मेशन उपलब्ध कराई थी?
* क्या डिले करदाता के रीजनेबल कण्ट्रोल से बाहर की परिस्थितियों के कारण हुआ?
* क्या पेनल्टी प्रोसीडिंग्स में उचित नोटिस और सुनवाई का अवसर दिया गया?
* क्या असेसिंग अफसर ने करदाता के एक्सप्लनेशन एवं सपोर्टिंग एविडेंस पर स्वतंत्र रूप से विचार किया?
* क्या पेनल्टी आर्डर में फैक्ट्स के आधार पर रिसंड फाइंडिंग दी गई है अथवा केवल मेकेनिकल मैंनर में पेनल्टी इम्पोस की गई है?


कार्यक्रम का स्वागत उद्बोधन एमपीटीसीए इंदौर ज़ोन के चेयरमैन सीए सत्यनारायण गोयल ने दिया। उन्होंने कहा कि बदलते कर कानूनों और बढ़ती कम्प्लायंस रिक्वायरमेंट के बीच टैक्स प्रोफेशनल्स के लिए नियमित टेक्निकल अपडेशन अत्यंत आवश्यक है।

सेमिनार का संचालन एमपीटीसीए के सचिव सीए शैलेन्द्र सिंह सोलंकी ने  किया। दोनों विशेषज्ञ वक्ताओं का परिचय सीए कीर्ति जोशी ने प्रस्तुत किया। तकनीकी सत्रों के दौरान प्रतिभागियों ने विभिन्न प्रैक्टिकल और लीगल इश्यूज पर विशेषज्ञों से सवाल किए, जिनका विस्तार से समाधान किया गया।

कार्यक्रम के अंत में सीए  राजेश मेहता ने आभार व्यक्त करते हुए धन्यवाद प्रस्ताव रखा।