देवराज इंद्र को बांधा गया था यही वैदिक रक्षासूत्र, आज भी उसी परंपरा से हो रहा निर्माण

देवराज इंद्र को बांधा गया था यही वैदिक रक्षासूत्र, आज भी उसी परंपरा से हो रहा निर्माण

देवराज इंद्र को बांधा गया था यही वैदिक रक्षासूत्र, आज भी उसी परंपरा से हो रहा निर्माण

स्वस्तिवाचन, मंत्रोच्चार और वैदिक विधि से तैयार होते हैं रक्षासूत्र

श्रावण शुक्ल पूर्णिमा पर रक्षासूत्र बांधने की परंपरा सनातन काल से चली आ रही है। पौराणिक मान्यता के अनुसार देवासुर संग्राम के समय देवराज इंद्र की रक्षा के लिए देवगुरु बृहस्पति और इंद्राणी ने स्वस्तिवाचन एवं मंत्रोच्चार पूर्वक उनके हाथ में रक्षासूत्र बांधा था। इसी वैदिक परंपरा का निर्वहन आज भी विधि-विधान के साथ किया जा रहा है।

मध्यप्रदेश ज्योतिष एवं विद्वत परिषद के प्रदेशाध्यक्ष आचार्य पंडित रामचंद्र शर्मा वैदिक ने बताया कि वैदिक रक्षासूत्र तैयार करने की प्रक्रिया स्वयं में एक विशेष अनुष्ठान है। रक्षासूत्र निर्माण से पूर्व गुरुपूजन किया जाता है तथा स्वस्तिवाचन एवं मंत्रोच्चार के साथ भूमि लेपन की प्रक्रिया होती है। इसमें गंगाजल और गाय के गोबर का उपयोग किया जाता है। इसके बाद हल्दी-कुमकुम से चौक बनाया जाता है और चौकी पर जल से भरा ताम्रकलश स्थापित किया जाता है। कलश में वरुण देवता का आह्वान एवं पूजन किया जाता है। मान्यता है कि यह पूजा पाशबंधन से मुक्ति एवं रक्षा का संकल्प प्रदान करती है।

ऐसे तैयार होता है वैदिक रक्षासूत्र

आचार्य शर्मा वैदिक के अनुसार रक्षासूत्र निर्माण में रेशमी एवं ऊनी वस्त्र के सूत्र का प्रयोग किया जाता है। इसमें केसर, चंदन, अक्षत, दुर्वांकुर, पीली सरसों और हरिद्रा के साथ सुगंधित पुष्पों की पंखुड़ियां मंत्रोच्चार पूर्वक रखी जाती हैं। इसके बाद विधि-विधान से सूत्र का अभिमंत्रण किया जाता है।

छह दशक से अधिक पुरानी है वैदिक परंपरा

आचार्य शर्मा वैदिक ने बताया कि यह वैदिक रक्षासूत्र निर्माण परंपरा पिछले छह दशकों से भी अधिक समय से निरंतर चली आ रही है। भारद्वाज ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान के संस्थापक उनके पूज्य पिताश्री स्वर्गीय नानूरामजी शर्मा के मार्गदर्शन में स्वस्तिवाचन पूर्वक अभिमंत्रित रक्षासूत्र तैयार किए जाते थे। आज भी उसी परंपरा और वैदिक विधि-विधान का पूरी श्रद्धा के साथ निर्वहन किया जा रहा है।

उन्होंने बताया कि तैयार किए गए रक्षासूत्र का सर्वप्रथम श्री गणेशजी, आशुतोष भगवान शिवजी, कुलदेवता, कुलदेवी और कुलभैरव को अर्पण एवं धारण कराया जाता है। इसके पश्चात मंत्रोच्चार पूर्वक परिवारजनों को रक्षासूत्र बांधा जाता है।

आचार्य शर्मा वैदिक ने कहा कि रक्षासूत्र केवल एक धागा नहीं, बल्कि वैदिक परंपरा में संकल्प, मंगलकामना और रक्षा का प्रतीक माना गया है। इसी वैदिक विधान से निर्मित रक्षासूत्र को देवगुरु बृहस्पति एवं इंद्राणी द्वारा देवराज इंद्र की कलाई पर बांधे जाने की परंपरा से रक्षाबंधन के पर्व का धार्मिक महत्व जुड़ा हुआ है।

आचार्य पंडित रामचंद्र शर्मा वैदिक
प्रदेशाध्यक्ष, मध्यप्रदेश ज्योतिष एवं विद्वत परिषद
मोबाइल: 9755014181