करवा चौथ के व्रत में छिपा प्रेम और समर्पण का भाव, मां के त्याग से बड़ा कोई बलिदान नहीं

करवा चौथ के व्रत में छिपा प्रेम और समर्पण का भाव, मां के त्याग से बड़ा कोई बलिदान नहीं

*करवा चौथ के व्रत में छिपा प्रेम और समर्पण का भाव, मां के त्याग से बड़ा कोई बलिदान नहीं*

- इन्द्रेश जी महाराज ने कथा के अंतिम दिन व्रत, प्रेम और परिवार के प्रति समर्पण का महत्व बताया

- सात दिनों में 50 हजार से ज्यादा श्रद्धालुओं ने किया भागवत कथा का श्रवण

इंदौर। करवा चौथ का व्रत केवल भूखे-प्यासे रहने की परंपरा नहीं, बल्कि अपने जीवनसाथी के प्रति प्रेम और समर्पण का भाव है। माताएं-बहनें अपने पति की लंबी उम्र और परिवार के कल्याण की कामना से यह व्रत करती हैं। यह बात इन्द्रेश जी महाराज ने श्रीमद्भागवत कथा के अंतिम दिन कही। उन्होंने कहा कि मां अपने बच्चों और परिवार के लिए लगातार त्याग करती है। उसका जीवन अपने लिए कम और दूसरों के लिए ज्यादा होता है। व्रत का भाव भी यही है कि व्यक्ति अपने सुख से पहले अपनों के सुख के बारे में सोचे।

आयोजक आशीष गोयल और अमृता गोयल ने कहा कि श्रीमद्भागवत कथा के सात दिनों में देश के अलग-अलग प्रांतों के साथ विदेश से भी श्रद्धालु इंदौर पहुंचे। इस दौरान करीब 50 हजार लोगों ने कथा का श्रवण किया। उन्होंने कहा कि परिवार के वरिष्ठजनों के आशीर्वाद और श्रद्धालुओं के सहयोग से इतने बड़े आयोजन को पूरा करना संभव हुआ। सभी ने अपने व्यस्त समय में से समय निकालकर कथा सुनी और भक्ति भाव से जुड़े। आयोजक परिवार ने सभी श्रद्धालुओं का आभार जताया।

*बहू का दायित्व केवल घर संभालना नहीं, परिवार का कल्याण भी*

महाराज ने देवी अहिल्याबाई होल्कर का उदाहरण देते हुए कहा कि उन्होंने अपने कामों से पूरे देश में अपने ससुराल और परिवार का नाम रोशन किया। बहू केवल रोटी बनाने के लिए ससुराल नहीं आती, बल्कि अपने व्यवहार और कर्मों से पूरे परिवार के कल्याण में योगदान देती है। उन्होंने अहिल्याबाई के जीवन से जुड़े एक प्रसंग के जरिए समझाया कि व्यक्ति को अपने यश और प्रशंसा के बजाय भगवान के गुणों का गान करना चाहिए। अहिल्याबाई ने भी अपने जीवन की प्रशंसा में लिखे गए ग्रंथ को स्वीकार करने के बजाय ब्राह्मण को भगवान की महिमा लिखने की सलाह दी थी।

*धन का उपयोग दान और सेवा में भी करें*

महाराज ने रुक्मिणी विवाह के प्रसंग के जरिए धन के उपयोग का महत्व समझाया। उन्होंने कहा कि लक्ष्मी का संबंध भगवान नारायण से है, उन्हें बेटी या मां के भाव से पूजे। व्यक्ति के पास धन बढ़े तो उसे केवल अपने सुख-सुविधाओं पर खर्च करने के बजाय दान और सेवा में भी लगाना चाहिए। उन्होंने धन के उपयोग के आधार पर लोगों को तीन श्रेणियों में समझाया और कहा कि श्रेष्ठ व्यक्ति वह है, जो अपनी संपत्ति का उपयोग दूसरों के हित में भी करता है। कथा और धार्मिक आयोजनों में किया गया खर्च भी श्रद्धा के साथ सेवा का माध्यम बन सकता है।

*सात दिनों तक कथा में उमड़ा श्रद्धालुओं का सैलाब*

महाराज ने इंदौर के श्रद्धालुओं के प्रेम और उत्साह की सराहना की। उन्होंने कहा कि कथा सुनने के लिए लोग कई घंटे पहले पहुंच जाते थे और युवाओं में भी भागवत के प्रति गहरा लगाव देखने को मिला। उन्होंने कहा कि व्यक्ति को अपने किए कामों का श्रेय स्वयं लेने के बजाय यह समझना चाहिए कि सब कुछ ठाकुरजी की कृपा से होता है। सात दिनों तक चले आयोजन में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने कथा का आनंद लिया। अंतिम दिन महाराज ने भागवत के विभिन्न प्रसंगों का सार सुनाते हुए श्रद्धालुओं को सत्संग से जुड़े रहने और जीवन में प्रेम, विनम्रता तथा सेवा का भाव बनाए रखने का संदेश दिया।